फिर एक कहानी: जात, जमात और जिंदगी

Delhi-AutoWala

ये दिल्ली भी अजीब शहर बनता जा रहा है। चलने को कुछ दिन में सड़क नहीं होगी शायद, कुछ इस तरीके से गाड़ियों की संख्या दिल्ली में बढ़ती जा रही है। लोग परेशान है और सरकार भी, कहते है की यहाँ की हवा ज़हर बन गयी है। पर लोग जो भी कहे, बिहार के बाद कुछ और रास आता है तो बस दिल्ली ही है। यही है जो वर्त्तमान में इतिहास को लिए भविष्य का निर्माण कर रहा है।
बहरहाल बहुत कुछ करने के बाद, हम भी इस दौर के साथ हाथ में हाथ मिलाये, नौकरी-चाकरी छोड़ कर स्टार्ट-अप कर लिए है। पहले 8 घंटे की नौकरी में ख़ुशी उतनी नहीं मिली जितनी अब 12 घंटे के काम में मज़ा आता है। रोज़ का यही है, 9 बजे मेट्रो पे सवार होकर मयूर विहार से ग्रीन पार्क।
उस दिन थकान बहुत थी, सो मेट्रो की भीड़ झेलने की हिम्मत नहीं थी। छठ के भीड़ के साथ छपरा से दिल्ली आने के बाद का थकान था, तो आप तो समझ ही सकते है की क्या लड़ाई लड़ी थी मैंने।
बहरहाल अपार्टमेंट के बाहर ही मंदिर के पास ऑटो वाले का जमावड़ा है अपना और वही अपने भोजपुरी में ब्रेकिंग न्यूज़ पर चर्चा करते है। चाय पर चर्चा, न न, मोदी वाला नहीं, ये सच्ची चर्चा होती है। नितीश जी का शपतग्रहण का बुखार अभी तक जिन्दा था यहाँ, लालू जी के बेटो पर चुटकी सब ले रहे थे। हम दखल डाल दिए चर्चा में।
बोले, “भइया शाहपुर जाट चलिएगा?”
गुट में से एक ने कहा, “हाँ हाँ, चलेंगे एकदम चलेंगे, ए रंजन ले जा हो”

मीटर चालू हुआ, हम ऑटो में और रंजन जी हमको ऑटो के साथ रवाना किये।हम फ़ोन निकाल के सोचे इधर उधर बात किया जाये, तो देखे फ़ोन 9 परसेंट चार्ज। तो दिमाग कहा की ड्राइवर का ही दिमाग खाया जाये।

“का भइया कब आये है आप छठ से”, संवाद शुरू किये।
“न भइया हम घर नहीं जाते है, दिल्ली ही घर है मेरा” ड्राइवर साहेब ने बोला।
हम मज़े लेते बोले,”क्या बात है लालू के आने का इतना डर हो गया है क्या की आप लोग बिहार को अपनाने से भी डर रहे है” और हसने लगे,
सुखी ही हंसी से उन्होंने कहा,”न भइया हम नहीं है बिहारी”
“क्या बात करते है, भोजपुरी तो आप ऐसे बोल थे की ठीक-ठाक जानकर नहीं बोल पाये आ आप हमको बुरबक बना रहे है”
“न भइया जन्मे वही थे हम फिर दिल्ली आ गए आ 20 साल होने को आ रहा है गए नहीं बिहार”
अचरज में आ कर मैंने पूछा,”इतना ललक पैसा कमाने का तो हमको भी नहीं है, कौन जिम्मेदारी लिए घूम रहे हो?”
“न, जिमेदारी नहीं भइया ई देहचुराना का मामला है, जाने दीजिए ई सब आप लोगो को नहीं बुझाएगा, ई छोट जात के गरीब घर में पैदा लेने का नतीजा है।” आवाज़ इतनी धीमी थी ये कहते हुए उसकी, की हवा और थोड़ी तेज़ होती या गाड़ी रफ़्तार में, तो सुनना मुश्किल था।

“इतना धीरे बोल रहे है आप की जैसे मेरा राजपुताना खून आपके छोटी जात के होने पर आपका खून ही कर देगा, इतना डरना कहे का” कहते हुए हम मुस्कुराये और फिर बोले, “अरे, कहे भाई कहे इतना डरते है आप लोग, कोई कुछ आपके परिवार को थोड़े मारा है, न ही आपकी माँ-बहन से छेड़खानी। करना धरना है नहीं, बदनामी फैला रहे है ढाई कोस”
गाड़ी हर शब्द पे वो ५ किलोमीटर और तेज़ भगा ने लगा, जैसे कुछ दबा गुस्सा उसका उस टेम्पू पर निकल रहा हो। मैंने सोचा गुस्सा टेम्पू निकला तो जान मेरी चली जाएगी, तो बेहतर था शब्दों पर ही वो निकल दे गुस्सा।
मैंने कहा,”अरे खिश टेम्पू पे कहे निकाल रहे है, बोलिए दीजिए, नहीं रखे है हम कोनो बन्दुक की आपको गोली मार देंगे।”

सोच से विपरीत, गाड़ी और तेज़ हुआ, और तिलमिलाए, चिलाते हुए उसने कहा, “कोनो झाट नहीं उखाड़ेगा मेरा, गाड़ में दम नहीं है, तबहुओ मारे थे आ आज भी चीड़ दंगे माधरचोद”

ऑटो रुका, “रे तुम गाली किसको दिया है, रुक अभी यही पर मज़ा सीखते है। जायेगा तुम जेल।”, ऐसा कहते मोबाइल निकल नंबर डायल करने लगे हम।
बड़े ही रोष में सुन रहा ड्राइवर, जेल के नाम से ऐसे बिखर गया जैसे घनघोर अपराध अपने सिर पे लिए घूम रहा हो वो और बस पुलिस को उसी की तलाश हो। खैर यही तरीका काम आता है जब लोग मीटर से नहीं चलते।
वो लड़खड़ाते आवाज़ में बोलने लगा,” मालिक रहे दी, माफ़ का दी, भइया माफ़ कर दीजिए खिस बर गया था, जाने दीजिए, कान धर रहे है” इतना कह कर अपने को ही झापड़ मारने लगा।
ये पुलिस का डर भी गजब है, इंसान बचाने लिए खुद शैतान जैसा डर पैदा कर देते है ये पुलिस वाले। बहरहाल, साला हद हो गया था, ये बस 2-5 मिनट में इतना उतार चढ़ाओ देखने के बाद, हम डर तो गए ही थे, सो दिए उसको पैसा बोले, और जाने को बोल दिए।

बाद में हम जब होश में आये तो देखे बारापुला पर खड़े थे जहा खाली ऑटो मिलना नामुनकिन था। यही ऑटो वाला आगे जा के साइड में ऑटो लगा रखा था, पैदल जाते देख  बोला,”आई न हमहि छोड़ दे तानी मालिक, गलती भ गइल ह”

दूसरा कुछ चारा मेरे पास भी नहीं था। बैठे, वो बोला, “जानते है भइया, इ जमाना आपको ख़राब बनता है ज़माने से ही पिटवाते है, हम लतखोर हो गए है। कितना सोचते है की चुप रहेंगे मगर देह में आग लग जाता है जात आ जमात का बात सुनके। खिसियायेगा नहीं तो एगो कहानी सुनाये आपको, हमारा ही है”

दिमाग अपने ही टेम्पर में था पर क्या ही कहते, अंदर मेरे भी यही चल रहा था की क्या ही हुआ होगा ऐसा जो ऐसी बात पर ऐसा रिएक्शन इसका, तो हम हाँ बोल दिए।

वो शुरू हुआ, कहा “जानते है भैया जात से चमार थे हमलोग और गाँव के चौहदी पर रहते थे। चमड़ा का काम छोड़ खेत बाटएया पर बोते थे।अ मालिक का ज़मीन था आपके ही जात के थे, हमलोग जाते थे हिसाब देते थे अनाज रखते थे अपना हिस्सा का ले आते थे।”

थूक घोट कर, बीड़ी निकला ऑटो वाला और जला के फिर चालू हुआ, “ऐसे ही समय बीतता गया, 8 साल के थे तब से खेत में खट रहे थे, 17 साल के हो गए थे तब। अब हिसाब मालिक नहीं उनका बेटा लेता था”

“एक दिन ऐसे ही खेत में थे हम, बहिन का चिलाने का आवाज़ आया, दौड़े गए हम,  देखे की मालिक के दोनों बेटे उसका हाथ मोड़ रहे थे। जाते मेरे बोला की मकई चूड़ा रही थी वो और इसलिए मार रहे थे उसे वो। उसी दिन से  बाबूजी ने उसका खेत में जाना बंद करा दिए।”
“महीना भर हुआ होगा उसके बाद, दिन दुपहरिया में बोवनी चल रहा था, सब खेत में आदमी-जन लगे थे, हम अंदर से बीमार थे, देह चुरा के सोचे घर चले जाते है आ आराम ले। हम घर चले  गए आ दरवाजा खटखटाये। कोई न खोला, कस के चिलाये तब भी नहीं। कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला, मालिक का दोनों बेटवा सब मेरे घर से निकला आ झापड़े-झापड़े बहुत मारा सब हमको, गाली दिया, आ कहा सब की काम पूरा नहीं होने दिए बहिनचोद।”

जो थरथराहट उसकी आवाज़ में थी, ऐसा लगा की आज भी, वो अभी भी जैसे वही मार खा रहा है।

आगे बोलते हुए उसने कहा की ,”जानते है सर, उस दिन हम थे बस जो रो रहे थे और,और लोग घेरे हंस रहे थे और कहते थे ‘रंडिया के भाई पिटाइल बा।’, जब मारते मारते थक गए वो,  तब छोड़ दिया, अंदर से दम करके कैसेहु उठे हम की घर में जा के कैद करले खुद को।”

कलेजा फाड़ कर जो आवाज़ निकलती होगी वो कैसी होगी उस दिन पता लगा था हमको, आगे कुछ कहने पहले रुका, बीड़ी जलाया और बोला , “अंदर, जानते है सर, मेरी बहिनिया थी। बिना कपडे, खटिया में बंधे मिली और माधरचोद.! मेरे गाड़ में दम नहीं था की जा के खोलते उसको। इतने में मेरी मतारी आई, आ बाप आ कर फिर से हम को मारा कहा ‘रे हरामी कहे अइले रे ऐजा, खेत में काम करे तोर सास आई, माधरचोद।'”
“रात भर उस दिन बहिन मेरी रोती जा रही थी, ये पहली बार नहीं था, जानते है पहली बार क्या था?  ये था की आज सब को और हमको ये जुलुम मालूम था। गर्मी का दिन था, गर्मी में रसोई में रात भर बैठी सगुनिया (शायद उसकी बहन का नाम होगा) रोती जा रही थी। अगले दिन आँख खुला तो बंद दरवाजा के पास माई आ बाबूजी,सगुनिया के लिटा के आ धोती ओढ़ाए थे उसको। ज़हर खा के मर गयी थी।”

किसी का बाप ये कहे तो क्या गुज़रे, कसम से मेरे सोच से परे था। न बेटी दुलार न कुछ, उल्टा इसको गाली। ये सब सुन कर माथा पकड़े बैठ गए हम। अफ़सोस था हमको। कुछ ज्यादा सोचते उतने में, एक लम्बी कस ले बीड़ी को सड़क पे फेक वो बोला , ” उस दिन खेत में अकेले गए हम, लोग हमसे पूछा की ‘कहा हैरे बाप  तुम्हारा, बेटी बेचता है साला, बेटीचोद ‘, हम चुप चाप बैठे रहे। लोग हंस के चल गए, रात के बाद जो अगली सुबह थी, उस दिन हम गाँव छोड़ आये और तब से अब तक नहीं गए।”
कुछ था नहीं मेरे पास कहने को उसको पर एक बार मैंने सांत्वना लिए ही बोला की, “माँ बाप के लिए ही चले जाते आप, किसके भरोसे जीते होंगे वो।”

उसने कापति हुई बनावटी हंसी में कहा,”गजब बात करते है आप भी भइया, साला बाप बेटीचोद था, हम बहिनचोद नहीं, बाप माँ को उसी दिन काट दिए थे हम जिस दिन खेत अकेले गए थे और उसी रात उसी गरासी से, ऊ दुनो माधरचोदवन को काटे थे ओकरे माँ बाप के साथ।”

काटो तो खून नहीं वाले हाल में मुझे अहसास हुआ की शाहपुर जाट आये मिनटों हो गया था, बिना कुछ बोले हम ऑटो से उतर थे उसे कोई नोट पकड़ा के, आँशु से लदे उसकी आँख को एक बार देखा था।

जात-जमात-और-जिंदगी

बहुत देर तक चिंता में डूबे मन को सुकून न था, बेचैनी थी। उसने अपने माँ बाप को भी मार दिया.!

Ritesh Singh
बिहार में जन्म हुआ और फिर भगवान ने बिहारी बनाया। तब से आज तक कुछ कुछ प्रयत्न कर रहे है कामयाब होने की।
गलती से IIT से B.Tech पास करने के बाद, AaoBihar पर लेख लिखना और पढ़ना शौक बन गया है।

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