गाँव के स्कूल की यात्रा

SchoolKiYatra
थी एक यात्रा गाँव की
जहाँ पढ़ते थे कुछ बच्चे
बताया गया था की
करते बहुत कुछ थे बच्चे

 

बड़ी ललक थी मेरे अंदर
झांकने की इनके अंदर
की आखिर अब
क्या क्या करते है बच्चें

 

पहुंच गया उस गाँव की
देखे वहाँ बहुत से खेलते बच्चें

 

आते हमे देख, रोक खेल को
भागे घर की ओर, बस्ता उठाये
स्कूल की तरफ को गए ये बच्चे

 

लोगो ने बच्चों को विद्यालय में जुटाया
तब तक जम कर हमको खाना खिलाया
खा कर पहुंचे हम स्कूल,
खुले आँगन में बोरी पर बैठे बच्चे

 

आधे मन से पड़ते बच्चे
ताकते रसोई की ओर थे
मिड-डे मील की आस पर
घसते कलम थे ये बच्चे

 

बात प्रारम्भ हुई बच्चे की किताब से
चित्र बने थे कई मंजिला ईमारत के
रसोई घरो की, सूट-बूट, परफ्यूम के
पूछा किसी ने देखा है कभी,
आँखों की सनाहट ने बताया
किताब से कितने कोस दूर थे बच्चे

 

रूचि शिक्षा में होती कैसे
देखते कुछ और,
पड़ते कुछ और थे ये बच्चे

 

इतने में अध्यापक आये
बोले क्या पूछते है साहेब
संस्कार से ही सब है
इन नन्हजातो में कहा खोजते है
पाते के चिपड़ी, सड़ेगे यही ये बच्चे

 

सिखाने वाले ने जब भाग्य लिख दिया हो
फिर हमारी क्या औकात, अध्यापक को प्रणाम कर
आज्ञा ले दूर निकल आये हम
खोखली जिंदगी, सन्नाटे में चिल्लाती होगी
सोच याद बहुत आते थे बच्चे

 

फिर एक बार जाऊंगा, एक रौशनी लिए
जो जलाएगा ऐसे अध्यापक को
दिखेगा नयी राह बच्चो को
iteachindia-eckovation
Ritesh Singh
बिहार में जन्म हुआ और फिर भगवान ने बिहारी बनाया। तब से आज तक कुछ कुछ प्रयत्न कर रहे है कामयाब होने की।
गलती से IIT से B.Tech पास करने के बाद, AaoBihar पर लेख लिखना और पढ़ना शौक बन गया है।

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