छठ पर खूबसूरत कहानी

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गाय के गोबर से घर लीपा गया

अकिला फुआ साड़ी का पल्लू सीधा करके गातीं हैं, “शुकवा जो मरबो घेवद से…”

घर आँगन दुआर से एक दिव्य सुगन्ध आ रही है। सेव सन्तरा केला अमरुद नारियल डलिया दउरा में सज गया है। बाप रे सबेरे से खेदन बो भौजी हमारी केतना परसान हैं आज तो बहुते काम करना है.

अभी तो अलता से गोड़ रँगना है. भौजी हमारी नए जमाने की तो हैं मगर नहीं आइब्रो सेट करवाएं. आज त भौजी दोगा वाली पियरकी साड़ी पेहनेंगी..लाल लाल चूड़ी बिंदी आ भर मांग सेनुर, ज़र न लगे भौजी को।

उधर चींटूआ रो रो कर सेव सन्तरा मांग रहा है..भौजी उसे समझाती हैं..”अरे नालायक सुबह खाया जाता है रे…” चींटूआ काली माई डीह बाबा से मनाता है जल्दी सुबह हो। खेदन उसे 2 रुपिया देकर भेजते है..”जा बबुआ छुरछुरिया खरीद लो.”

भौजी बबुआ का नज़र उतारती हैं…केतना मासूम है अभी..छठ माई जैसे एक बबुआ दी हैं वैसे ही एक बबुनी दे देंगी तो अगले साल कोसी भरेंगे आ घाट पर बाजा बजवायेंगे। लिजिए इधर चार साल बाद बबिता मीना रीना आ पिंकी छठ में नइहर आई हैं.

आज तो सब सखी सहेली घाट पर मिलेंगी..काल्ह से ही मीना बबिता को चिढ़ा रही “केतना मोटा गई है रे..जीजा जी आटा चक्की चलाते हैं क्या.”?

सब हंसते हैं, इधर गाँव का गुड्डू दीवाना भी मने मन खुश है. उसकी मासूका आनंदी आज दू साल बाद गाँव आई है. आय हाय कैसे नज़र मिला पायेगा आनंदी से…सूना है उसका गोड़ भारी है. मने उसका लइका उसे मामा कहेगा. मर न जाये गुड़ुआ ई सुनने से पहले. अभी भी परेम फफाता उसका…रघु राय के बगइचा में पेयार का पहला चुम्मा पिंकी कैसे भूल सकती है। खैर अभी गाँव के कुछ लौंडे छठ घाट सजा रहे हैं.

बड़ा कम्पटीशन है भाई, बगल वाले गांव के घाट से. उ तीस ठे हार्न बजा रहे है. इ पैंतीस ठे, आज शारदा सिन्हा जी का दिन है. उन्हीं का गीत सुबह से बज रहा। क्या करे उत्साह जो है. सब कितना खुश हैं गर्व होता है अपनी परम्परा पर..ये त्यौहार न रहे तो जीवन कितना बेसुरा बेताला हो. यही साल भर में एक बार आकर उमंग उत्साह और आनन्द से भर देते हैं. आदमी एकदम नया हो जाता है !

आप सबको छठ की हार्दिक शुभकामनाएं।

कहानी साभार # Atul Kumar Rai

Chirag
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