डड़ौंकी

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

घर में बिटिया सयान हौ, बेटवा बेरोजगार हौ
सुरसा सरिस बढ़ल मंहगाई, बेइमान सरकार हौ
काटत-काटत, कटल जिन्दगी, कटत न ई जंजाल बा ।

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा

हमके लागत बा दहेज में बिक जाई सब आपन खेत
जिनगी फिसलत हौ मुट्ठी से जैसे गंगाजी कs रेत
मन ही मन ई सोंच रहल हौ, आयल समय अकाल बा ।

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा।

कल कह देहलन बड़कू हमसे का देहला तू हमका
खाली आपन सुख की खातिर पैदा कइला तू हमका
सुनके भी ई माहुर बतिया काहे अटकल प्रान बा

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

ठक-ठक, ठक-ठक, हंसल डंड़ौकी, अब तs छोड़ा माया-जाल
राम ही साथी, पूत न नाती, रूक के सुन लs काल कs ताल
सिखा के उड़ना, देखाss चिरई, तोड़त माया जाल बा

उठल डड़ौंकी चलल हौ बुढ़वा दिल में बड़ा मलाल बा ।

कवि- देवेन्द्र कुमार पाण्डेय

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