दुःख बिहारी औरत का: “रैलियां बैरन पिया को लिए जाये रे”

कहानी बिहार की बहुत पुरानी है, पहले अँगरेज़ बिहार से मजदूरो को बंगाल भेजते थे, फिर वहाँ के बाद सिलसिला पंजाब का सुरु हुआ, फिर बम्बई का और अब लोग अरब जाने लगे है। इन सब में जो दो चीज़े नहीं बदली है वो ये है
१. सब के सब अपना परिवार, अपनी नव-विवाहित पत्नी को अपने घर पर छोड़ जाते थे
२. जाने का सबके एक ही माध्यम था रेल

इसी तर्ज़ पर बिहारी लोकगीत कजरी का एक गीत बहुत प्रसिद्द है, जो एक औरत गाती है जब उसे पता चलता है की उसका मरद जाने वाला है। इस गीत से आप कल्पना जरूर कर सकते है उस दर्द का।

Bihar-Family-Photo-by-Steve-Bell

इस तरह कुछ गीत शुरू होता है…

रैलियां बैरन, रैलियां बैरन पिया को लिए जाये रे,
रैलियां बैरन

सोचती है रेल में टिकट लगता है और वो कागज का, तो कहती है

जवने टिकटवा से पिया मोरे जईहे,
जवने टिकटवा से
जवने टिकटवा से पिया मोरे जईहे,
पनिया बरसे
पनिया बरसे, टिकट गल जाये रे

रैलियां बैरन,
रैलियां बैरन पिया को लिए जाये रे,
रैलियां बैरन

अच्छा ये न सही, पर पता चलता है की पिया इस शहर को जा रहे है, तो शहर को ये दुखिया क्या कहती है

जवने सहरवा में पिया मोरे जाये
जवने सहरवा में
जवने सहरवा में पिया मोरे जाये
आगे लागे की
आगे लागे की, सहर जल जाये रे

रैलियां बैरन,
रैलियां बैरन पिया को लिए जाये रे,
रैलियां बैरन

फिर कही से कान में बात जाती है, की साहेब पिया का उससे उसे छीने जा रहा है, तो इस पर कहती है

जवने साहेबवा के सैया मोरे नौकर,
जवने साहेबवा के
जवने साहेबवा के सैया मोरे नौकर,
गोली दागे,
गोली दागे, साहेब मर जाये रे

रैलियां बैरन,
रैलियां बैरन पिया को लिए जाये रे,
रैलियां बैरन

ये था कजरी बिहार से, लोकगीत की महत्वता कम नहीं हो सकती। हा हो सकता है थोड़े वक़्त के लिए सही हम भटक जाये पर घर वापस तो आयेगे ही।

Ritesh Singh
बिहार में जन्म हुआ और फिर भगवान ने बिहारी बनाया। तब से आज तक कुछ कुछ प्रयत्न कर रहे है कामयाब होने की।
गलती से IIT से B.Tech पास करने के बाद, AaoBihar पर लेख लिखना और पढ़ना शौक बन गया है।

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