नयी शुरुआत को दबा क्यों देते हो

Poetry
नयी शुरुआत को दबा क्यों देते हो
अपनी आवाज़ को खुद में भुला क्यों देते हो
 
नहीं होगा, या मानता नहीं होगा ये जमाना
खुद की हस्ती, खुद से ही तुम क्यों मिटा देते हो
 
अभी तो ठीक है, मगर रात के अँधेरे में सपने पूछेंगे
क़त्ल सपनो का कर तुम, खुद को क्या देते हो
 
सुबह की आकाश में उड़ रहा पंछी
पूछेगा उड़ान पिंजोडो में बंद क्यों कर देते हो
 
सुनो, उठो, चलो, उड़ो की अब बहुत हुआ,
शीशों के ग्लास में बंद कमरों में टहल-टिकोरा बहुत हुआ,
 
ये ओढ़े उजली साड़ी में वतन उजड़ा नज़र आता है
रंगीन सपनो से रंग चुरा रंगरेज़ बन क्यों नहीं जाते हो
Ritesh Singh
बिहार में जन्म हुआ और फिर भगवान ने बिहारी बनाया। तब से आज तक कुछ कुछ प्रयत्न कर रहे है कामयाब होने की।
गलती से IIT से B.Tech पास करने के बाद, AaoBihar पर लेख लिखना और पढ़ना शौक बन गया है।

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