Poem: बदलाव

Change

जो दिखता है वो सच है

या समय की मांग (demand)

मानो जाड़े के आने से

एक धुंध सी लगी हो

जिसने सबकुछ ढंक रखा हो

अपने बाँहो में सिर्फ सामने

जो है वही दिखता हो

और जो सामने दिखता है

वह है स्वार्थ में लिपटे

असंख्य लोग जिन्होंने

पल-पल को बाँट रखा है

फायदे और नुकसान के तराज़ू से

इस दृष्य में व्यग्रता है और

छटपटाहट सब भागने में लगे है

किस ओर और क्यूँ मालूम नही

सबसे बड़ी व्यथा ये है की

प्रेम की परिभाषा बदल गयी है

या प्रेम करने की सोच

पर अजीव बदलाव है ये

Demand and Supply के इस चेन में

हर समीकरण बदल गया है

लोग पूरी जिंदगी की ख़ुशी

एक पल में हांसिल कर लेना चाहते है

इंसान मृत्यु के डर से घबरा गया है

या ज्यादा चतुर हो गया है ये

तो नही जानती

परन्तु एक बात है-

जो लोग प्लान करके बैठे है

सालो का उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नही

आनेवाला पल कैसा होगा

क्योंकि इंसान भले ही खुद को तेज़ समझे

प्रकृति से परे स्वंय देव भी नहीं

पर मुझे विश्वास है वक़्त बदलेगा

और समय की मांग भी

फिर यह धुंध भी छंट जाएगी

उस दिन सब साफ नजर आएगा।

 

Chanchal Sakshi
I’m a designer, author, journalist, photographer and blogger from Bihar District Sitamarhi. Found this site interesting so would like to share my poem here. hope you guys will like it :)

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