मेरा छोटा सा शहर छपरा

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अधपकी सी राह,
धुल बहुत उडाती है ।
अलकतरे से बनी सड़क,
इसी रास्ते में थोड़ी दूर आगे आती है ।
ये सूखे पेड़ नल के लिए उखड़े थे,
पानी नल का अभी तक किसी ने नहीं पीया,
बेचारे पेड़ो को तो मिलता था ।
नल कल आएगा,
अभी हाथो पे बहुत है भरोसा,
नगरपालिका पे नहीं,
उनकी भी कुछ खास नहीं चलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

राही के लिए,
अभी भी दो चार खिड़कियाँ खुलती है,
हां, पानी सिर्फ एक से मिलती है,
मिसरी पूछना,
शायद दुकानदार दे दे तोड़ के,
न होगा तो देगा मीठा फोड़ के,
ज्यादा का इरादा दिखाना, पर,
दे देना हिसाब जोड़ के,
भाई साहब, दूकान उतनी भी नहीं चलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

सबके कपडे गंदे है,
साफ़ कपडे हर मकान के,
आगे – पीछे, ऊपर – निचे लटक रहे है,
झाग वाला पानी,
हर नाली में बहता दिख जाता हैं,
पसीना हैं कॉलर के कालेपन का कारण,
और कल की शादी में,
उफ़, लग गई थी थोड़ी सी हल्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

हमसफ़र और आप,
दोनों झूमते हुए चलेंगे,
दर्द भरा गाना बहुत तेज बजता है यहाँ रास्ते भर ।
एक दो को छोड़कर,
टेम्पो में किसी को नहीं जल्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

गाँव की तरह तो नहीं,
पर हां लगभग
कुछ ही अंतर पे
कोई पूछ लेता है,
आप उनके परिवार से तो नहीं?
उनके बेटे तो नहीं?
माफ़ कीजियेगा, आपकी शक्ल बहुत हैं फलां से मिलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

इस छोटे से शहर में,
बिछड़े, बार बार मिलते है,
बहुत दिन बाद जो मिला
है यकीं वो शहर में नहीं था
कहेगा, की इतने कम रुपयों
में बीबी बच्चो का पेट नहीं पलता,
रसोई रोज नहीं जलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

बरामदे में लालटेन,
कोशिश करता रहता हैं, जलने की,
भीतर कमरे में इमरजेंसी लाईट का सहारा है,
शाम वो खुशनसीब,
जिस दिन ऊँचे टंगे बल्ब टिमटिमाते
वोल्टेज बढ़ा नहीं, जबकि पंखे तो चले नहीं जी पुरे सर्दी ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

सुबह की भीड़ के 6 ही मंजिल,
रेल, स्कूल, दफ्तर,
दूकान, सिनेमा और मंदिर ।
शाम की भीड़ को,
इस छोटे से शहर की
छोटी – छोटी गलियां
है निगलती ।

मेरा छोटा सा शहर छपरा,
यहाँ होते थोड़े से काम सही,
और होती थोड़ी सी गलती ।

Written By:- नितीश कुमार

Subhikhya
Not from Bihar, heard a lot about the state. Always interested in exploring the art culture and politics of the state. So here I am, writing and doing PR for AaoBihar.com
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