मेरा भागलपुर: “बनफूल”

Banphool

भागलपुर में एक पैथोलजिस्ट हुआ करते थे बलाई बाबू; डा. बलाई चंद मुखोपाध्याय. खलीफाबाग बाज़ार के निकट ही उनका दवाखाना था. दवाखाने के बरामदे पर लाल रंग का एक साइनबोर्ड लगा था जिस पर बड़े बड़े सफ़ेद अक्षरों में लिखा था “बलाई बाबू का दवाखाना”. बड़े सहृदय डाक्टर थे. उनका जन्म तत्कालीन पूर्णिया जिले के मनिहारी (जिसे बंगालियोंके तर्ज में वे मोनिहारी बोलते थे) बस्ती में हुआ था जहाँ उनके पिता जिला बोर्ड के अस्पताल में डाक्टर थे. स्कूली शिक्षा उन्हों ने साहेबगंज के रेलवे स्कूल में पूरी की और सेंट कोलम्बास हज़ारीबाग़ से इंटर कर उन्होंने कलकत्ता मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था. डाक्टरी की पढ़ाई के आखिरी वर्ष उनका स्थानांतरण पटना में नए खुले प्रिंस ऑफ़ वेल्स मेडिकल कॉलेज में कर दिया गया जहाँ से 1928 में वे डाक्टर बन कर निकले. कुछ वर्ष कलकत्ते और आजिमगंज में काम करने के बाद उन्होंने भागलपुर को अपना लिया और 1968 तक भागलपुर ही रहे.

अपने स्कूल के दिनों से उन्हें कविता लिखने की बीमारी लग गयी थी. उनके शिक्षक चिंतित हो गए थे कि अगर ये कवितायेँ लिखते रह गए तो पढ़ाई में पिछड़ जायेंगे. फलतः प्रधानाध्यापक ने उन्हे कविता-कहानी लिखने से बिलकुल मना कर दिया था. पर आप लिखना छोड़ नहीं पाये और शिक्षकों से छुपे रहने के लिए प्रकाशन के लिए अपनी रचनाएं “बनफूल” के नाम से भेजने लगे, जिस नाम से आप आज भी याद किये जाते हैं. अपने लम्बे रचना काल में आप ने साठ उपन्यास, पांच सौ से अधिक कहानियां, कुछेक नाटक और अनेक कवितायें लिखीं.

बनफूल की अनेक रचनाओं पर फिल्में भी बनीं. “हाटे-बाजारे” पर इसी नाम से बहु चर्चित बांगला फ़िल्म बनी थी. मृणाल सेन के निर्देशन में उनके “भुबन शोम” उपन्यास पर “भुवन शोम” नाम से हिंदी फ़िल्म भी बनी जिसे तीन राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार भी मिले थे. गुरुदेव को आप की लघुकथाओं में ओ हारा और चेखोव की झलक मिलती थी. आलोचकों को बनफूल की गद्य-रचनाओं में नन्दलाल बसु की तूलिका की सहजता दीखती थी. (नन्द लाल बसु का जन्म भी भागलपुर के निकट खड़गपुर में हुआ था).  कहानियों में जीवन के विरोधाभासों के सहज चित्रण से उनके लेखन शिल्प की गहराई और पात्रों या कथा वस्तु की विविधता से उनकी बहुमुखी सृजनात्मकता झलकती है. उनकी तकनीक संयमित, दिखावा रहित पर “महीनी” से भरी हुई है. उनका दृष्टिकोण सदैव स्वतंत्र और निरपेक्ष रहा.

वर्ष 1962 में जब हम लोग भागलपुर के निकट सबौर रहते थे, मुझे उनके साथ कुछ घंटे बिताने का सौभाग्य मिला था. एक बार वे  रात्रि भोजन के लिए आमंत्रित थे. बाबूजी से मेरी उम्र पूछ कर वे मेरे लिए दो किताबें लाये थे. पाठ्य पुस्तकों को छोड़ दें तो पहली बार मुझे किताबें मिलीं थी – मेरी पहली अपनी दो किताबें. एक थी “ऊंचे पर्वत” जो जॉन स्टीनबेक के उपन्यास “दि रेड पौनी” का संक्षिप्त हिंदी रूपांतर था. दूसरी बलाई बाबू की अपनी किताब भुबन शोम का हिंदी अनुवाद था “शिकारी”.  मुझे याद है मैं ने दो सप्ताह बीतने के पहले “शिकारी” पढ़ ली थी. इसकी कहानी हमारे अपने क्षेत्र की थी – भागलपुर और साहेबगंज के बीच गंगा के बलुआही तटों पर साइबेरियन बत्तकों के शिकार की. इसमें वर्णित स्टीमर को मैंने देख रखा था. वैसे ही रेत के टापुओं पर उन्ही बत्तकों की खोज में मैं एकाध बार पिछलग्गू बन कर स्थानीय शिकारियों के साथ जा चुका था. अगले कुछ महीनों में मैंने शायद चार पांच बार इस किताब को पढ़ा हो. इसका असली आनंद मुझे 1970 में मिला जब स्कूल छोड़ने के बाद मैंने इसे फिर पढ़ा. बलाई बाबू से मिलने की इच्छा भी हुई पर वे 1968 में भागलपुर छोड़ कलकत्ते बस गए थे. बाद में भुवन शोम फ़िल्म भी देखी – दुःख हुआ कि कहानी भागलपुर जिले के परिप्रेक्ष्य में लिखी गयी थी पर उसका फिल्मांकन गुजरात में किया गया था.

बलाई बाबू का देहांत 1979 में कलकत्ते में हुआ. उनकी सहृदयता के कारण भागलपुर के ग्रामीण उन्हें “शिवजी महाराज” या “शिव जी महादेव” कहा करते थे.

Krishna Kumar
The state of Bihar has given a lot to the history of humanity but in recent past we had given child labour, women harresment, theft, murder and corruption. I am here to raise the voice.!

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