ये हैं रियल भाई जान: पंद्रह साल में एक पल को भी नहीं हुए जुदा, साथ पास की IIT

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बिहार के समस्तीपुर के दो भाई बसंत और कृष्ण की जोड़ी जो पंद्रह साल से साथ-साथ थे, एक के बिना दूसरा अधूरा- दोनों से साथ पढाई की एक भाई दूसरे को अपनी पीठ पर लादकर साथ स्कूल- कोचिंग ले जाता। दोनों की कड़ी मेहनत और लगन एेसी कि शिक्षक भी अभिभूत रहते थे।

दोनों कोटा में इंजीनियरिंग की कोचिंग करने आए और एक भाई दूसरे को तीन साल तक अपनी पीठ पर बैठाकर कोचिंग और घर लाता, ले-जाता रहा। अब दोनों भाइयों ने एक साथ आईआईटी में सफलता पाई है। एक भाई कृष्ण को जहां ओबीसी 38 वीं रैंक मिली है वहीं बसंत की 3769 रैंक आई है। लेकिन सफलता की ये सौगात दोनों के लिए दुख भी लेकर आई है।

दोनों को इस बात का दुख है कि दोनों को अलग अलग संस्थानों में प्रवेश मिला है। दोनों 15 साल बाद अलग-अलग रहेंगे। इस गम में दोनों इतने दुखी हुए कि दो दिन तक ठीक से खाना तक नहीं खाया।

आसान नहीं थी राह

दोनोें भाइयों के लिए यहां तक पहुंचने की राह आसान नहीं थी। दरअसल, डेढ़ साल की उम्र में पोलियो ने कृष्ण के दोनों पैर छीन लिए, एक हाथ ने भी पूरी तरह से काम करना बंद कर दिया। कोई और आसरा नहीं था तो कृष्ण स्कूल ही नहीं जा सका। छोटा भाई बसंत स्कूल जाने लगा, तो पीठ पर बैठाकर बड़े भाई को भी साथ ले जाने लगा।

साथ-साथ रहे, पास कर ली आइआइटी

यह सिलसिला 15 साल तक चला। दोनों कभी एक-दूसरे से अलग नहीं रहे। दोनों ने इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए कोटा भी दोनाें साथ आए। यहां भी 3 साल तक बसंत पीठ पर बैठाकर कृष्ण को कोचिंग और कमरे तक का सफर कराता रहा। कड़ी मेहनत के बाद अब दोनों ने एक साथ आईआईटी की परीक्षा पास कर ली है।

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दोनों को मिली है अच्छी रैंक

कृष्ण को ओबीसी पीडब्ल्यूडी कोटे में अखिल भारतीय स्तर पर 38वीं और बसंत को ओबीसी में 3769 रैंक मिली है। परिवार के साथ ही दोनों को इस बात की खुशी भी है कि दोनों ने कड़ी मेहनत कर साथ-साथ सफलता पाई है लेकिन दोनों को इस बात का दुख भी है कि अब उनको अलग होना पड़ेगा।

उनके पिता किसान मदन पंडित करीब 5 बीघा जमीन पर आश्रित हैं। उनके 6 बेटे हैं, दो बड़े भाई मुंबई के किसी गैराज में काम करते हैं। एक भाई इंजीनियरिंग कर रहा है। एक छोटा भाई अभी 10वीं में है। पढ़ाई का खर्च दोनों बड़े भाइयों ने उठाया।

15 साल हो गए, हम कभी अलग नहीं हु्ए

कृष्ण को अब बिछुड़ने का दुख है। वह बताता है कि बसंत मुझे कंधे पर बिठाकर क्लास ले जाता है। घर से लाता है, खाना लगाता है। इधर, बसंत बताता है कि भाई के लिए कुछ भी करता हूं तो खुशी होती है। मैं भी कृष्ण के बिना नहीं रह सकता। पिछले दिनों ही गांव से आते समय इतने दुखी थे कि दो दिन तक ठीक से खाना नहीं खाया।

Source: Jagran

Sanskriti
A girl from the capital of Bihar, trying to understand the past underdevelopment of Bihar and exploring the ways to improve the status of the State

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