रह गइल

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बूँद भर पानी के खातिर मन तरस के रह गइल,

उमड़ के आइल घटा हालत प हँस के रह गइल ।

जब कि पथरा गइल कब से ई नजरिया हार के,
आज उकठल काठ पर सावन बरस के रह गइल ।

हर जगह बालू के पसरल बा समुन्दर दूर तक ,
दूर से आइल ई पातर धार फँस के रह गइल ।

सोच में बीतत रहल बा जब कि जुग-जुग से समय,
जिन्दगी फाँसी बनल गरदन में कस के रह गइल ।

लोग चारो ओर हमरा पर तरस खाइल बहुत ,
हाय, करइत साँप अइसन लाज डँस के रह गइल ।

– पांडे कपिल जी

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