होली खासकर भोजपुरिया होली पर एक लेख

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जइसे लचके लवंगिया के डार..!

दुनिया के दो सबसे पुराने और बड़े समूह गान – फगुआ (होली) और चैती – भोजपुरी क्षेत्रों में आज भी जवान है। समय ने उसकी शोखी कम करने की यूं तो हजारों कोशिशें कीं, लेकिन वह इतनी मनशोख इतनी अल्हड़ है कि समय को भी मात देती नजर आती है। पुराण व अन्य हिंदू धार्मिक ग्रंथ बताते हैं कि होली शुद्रों का त्योहार है, लेकिन विडंबना देखिए कि हिंदुस्तान के सभी त्योहारों पर होली अकेले भारी है। इसका जादू किसी को नहीं छोड़ता, सभी इसके रंग में रंग जाने को बेताब हो उठते हैं। सभी वर्णों के सभी त्योहारों में से होली अलहदा वह पर्व है, जो भाईचारा का पैगाम लेकर आता है। इसका जीवंत मूर्त रूप अगर किसी को देखना हो तो, वह बनारस समेत तमाम भोजपुरी क्षेत्रों में देख सकता है।

फगुनहट के झकोरे के साथ ही भोजपुरी क्षेत्रों का मिजाज और माहौल बदलने लगता है। मौसम की रवानी चेहरों पर चमकने लगती है और एक अजीब-सा अलमस्त खुशनुमा मंजर खिल उठता है। फगुनहट की बयार से तन-मन रोमांचित होने लगता है। मन गाने लगता है और तन तरना उठता है। यूं तो पूरे देश में होली मनाई जाती है और विशिष्ट होली मनाने के संदर्भ में भोजपुरी इलाकों की कोई गिनती भी नहीं होती। यह भी सच है कि ब्रज की होली जैसी किसी विशिष्ट होली के लिए भी भोजपुरी इलाके नहीं जाने जाते, लेकिन इतना तो निश्चित है कि होली अपनी पूरी सामूहिकता और सरसता के साथ अज भी भोजपुरी प्रदेशों में ही दिखाई देती। है। होली की शुरुआत होते ही गांव के बूढ़े-नौजवान ढोलक-झाल लेकर होली गाने के लिए इकट्ठा हो जाते हैं। यहां कोई बड़ा-छोटा नहीं होता, बल्कि होते हैं तो सिर्फ मस्त कलंदर। भोजपुरी प्रदेशों में होली सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि फागुनभर यानी पूरे महीनेभर मनाया जाता है। वसंत पंचमी से शुरू होकर फाल्गुन के अंतिम दिन यानी होली के दिन तक पूरा भोजपुरी प्रदेश फगुआ की स्वर लहरियों से गुंजायमान रहता है। सच है कि होली की स्वर लहरियों की तान आज कमजोर हुई है, लेकिन इसके बावजूद उसकी रंगत बहुत जगह बाकी है।

वसंत पंचमी के दिन से फगुआ की तैयारी शुरू हो जाती है। बच्चे और किशोर होलिका दहन के लिए सामग्री इकट्ठा करने की जुगत में लग जाते हैं, जिसे किसी खास तयशुदा जगह पर रखी जाती है। बागों और बधार से तो वे लकड़ी व अन्य सामान जुटाते ही हैं, किशोरों के छोटे-छोटे दल घर-घर जाकर भी लकड़ी, उपले आदि मांग लाते हैं। ये लड़के जब किसी के यहां लकड़ी या उपले मांगने पहुंचते हैं तो एक गीत गाते हैं, जिसके बोल होते हैं – ए यजमानिन, तोहरा सोने के केवाड़ी…..पांच गो गोइठा द। मजे की बात है कि ये लड़के घर के मालिक से उपले नहीं मांगते, बल्कि घर की मालकीन से मांगते हैं। लड़कों की टोली तब तक गाती रहती है, जब तक उन्हें उपले या लकड़ी मिल नहीं जाते। महिलाएं भी उनकी याचना का खूब रस लेती हैं और उपले तभी देती हैं, जब उन्हें लगता है कि याचना काफी हो चुकी है। भोजपुरी क्षेत्रों में फागुन महीने की हर शाम संगीत संध्या बन जाती है। यह होली कोई एक ही जगह पर नहीं होती, बल्कि उसका स्थान रोज ही बदल जाता है। फागुन सभी को अपने रंग में चहबोर कर देता है। हर दिल जवान हो जाता है और हर किसी को हर किसी से हंसी-ठिठोली करने का लाइसेंस मिल जाता है। रिश्ते अपनी पुरानी पहचान का केंचुल उतार कर नया परिधान पहन लेते हैं। कल की उतरी बहुरिया भी ससुर-भसुरों पर चुपके से रंग डाल देती है। तभी को कहते हैं कि ‘भर फागुन बुढ़ऊ देवर लागें।’ कौन नहीं डूबना चाहेगा इस मस्ती के आलम में।

मत पूछिए, होली के दिन का आलम कैसा होता है। सुबह से ही लड़कों, जवानों और युवतियों की टोलियां गांव में रंग खेलने निकल जाती हैं। ये टोलियां गांव के सभी घरों में जाती हैं यानी हर कोई हर किसी के घर रंग डालने पहुंच जाता है। बहुएं खास कर नई बहुएं दूसरों के घर होली खेलने तो नहीं जातीं लेकिन उससे क्या, रिश्ते की सभी ननदें और देवर स्वयं उससे रंग खेलने उसके घर पहुंच जाते हैं। आज कोई मनाही नहीं होती, कोई अन्यथा वर्जना नहीं होती। रंग डालने का यह दौर दोपहर तक चलता है। इस दौरान एक-दूसरे पर कीचड़ डालने का कार्यक्रम भी चलता रहता है। वैसे अब कीचड़ का इस्तेमाल कम ही होता है। भोजपुरी प्रदेशों में होली दो चरणों में खेली जाती है। दोपहर के पहले वाली होली में हुड़दंग भी देखने को मिल जाता है। लड़के उन बुजुर्गों पर रंग या कीचड़ ज्यादा डालते हैं, जो ज्यादा गुस्सा करते हैं और गुस्से के साथ उनके मुंह से गालियां भी पिचकारी की तरह निकलती हैं। सच तो यह है कि ऐसे लोगों पर कीचड-रंग डाला ही इसलिए जाता है कि वे गाली दें। अगर वे गाली नहीं देते हैं, तो रंग-कीचड़ डालने वालों को ऐसा लगता है, जैसे उनकी सारी मेहनत व्यर्थ गई। दोपहर के बाद होली का दूसरा अध्याय शुरू होता है। सभी लोग नहा-धोकर नए कपड़े पहनते हैं और उसके बाद वहां पहुंचते हैं, वहां जिसके घर से ताल उठने वाला होता है। यानी जिस घर से होली गाने की शुरुआत होने वाली होती है। दालान के बाहर बिछे दरी, कालीन पर लोग बैठ जाते हैं। गाने वालों की टोली आगे बैठती है, जबकि अन्य लोग पीछे बैठ जाते हैं। इसका मतलब यह नहीं कि जो पीछे बैठते हैं, वे गाते नहीं। वे गाते हैं लेकिन गीत-संगीत को नियंत्रण में रखने का काम आगे बैठे लोग ही करते हैं। यह कितना बड़ा आश्चर्य है कि सौ-दो सौ लोग एक साथ गाते हैं। कोई उसमें निर्देशक नहीं होता, लेकिन क्या मजाल की झाल की एक ताल भी गलत पड़ जाए। सदियों से गाते-गाते शायद ताल उनके जीवन में पैबस्त हो गया है।

संगीत और बहादुरी ही तो भोजपुरियों की पहचान रही है। आज भी भोजपुरी क्षेत्रों में लोगों के हाथों में लंबी लाठी और कंठ से फूटती स्वर लहरी को देखा-सुना जा सकता है। अकारण नहीं कि भोजपुरी क्षेत्रों की होली में वीरता और श्रृंगार का भाव ही प्रधान होता है। गवनई शुरू होने के पहले उपस्थित लोगों को माजून और ठंढई से स्वागत किया जाता है।

भोजपुरी प्रदेशों में 1857 के गदर की अहमियत है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आज भी होली की शुरुआत बिहार में गदर के नायक बाबू कुंअर सिंह की प्रशस्ती से होती है। गाने वाले जब ‘ बंगला में उड़ेला अबीर ….बाबू कुंअर सिंह तेगवा बहादुर ’ की तान छेड़ते हैं तो सुनकर रोमांच होने लगता है। कहीं-कहीं इस गीत से भी शुरुआत होती है कि ‘बाबू कुंअर सिंह तोहरे राज बिनु हम ना रंगइबो केसरिया।’ यानी भोजपुरी प्रदेशों में होली की शुरुआत वीर रस से ही होती है। यहां तक कि कृष्ण जैसे रास रचाने वाले रसिया के भी वीर रूप का ही वर्णन होता है। उदाहरण के लिए ‘लड़िका हो गोपाल, कूद पड़े यमुना में।’ लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि इन क्षेत्रों में श्रृंगार के गीत नहीं गाए जाते।

श्रृंगार रस से सराबोर गीत तो इतने लुभावन होते हैं कि उसे सुनकर संन्यासी का मन भी डोल जाए। ‘अंखियां भइले लाल, एक निंद सुते द बलमुआ ’ सुनकर किसका कामना न जाग उठे।

होली में विरहिणी अपने प्रीतम का इंतजार कर रही है। उसका मन अपने प्रीतम से मनुहार करना चाहता है, उसे प्यार करना चाहता है, लेकिन प्रीतम पास हों तब न। उसके मुंह से बोल फूट पड़ते हैं, ‘फगुआ में अइते बलमुआ ते धई लेतीं भर अंकवार….रखतीं नयनवा के भीतर लागहूं ना दिहतीं बयार।’ कौन ऐसा कठकरेज होगा, जिसका मन इस होली को सुनकर अपनी प्रिया से मिलने को मचलने न लगे।

भोजपूरी होली गीतों में देवर-भाभी और ननद-भाभी की हंसी-ठिठोली को भी बखूबी चित्रित किया जाता है। ननद अपनी भाभी से पूछती है……
‘चोलिया बूटीदार ई रंग कहवां से पवलू।किया चोलिया तोरा नइहर से अइले, किया तोरे भेजले इयार हो,’ तो भाभी जवाब देती है, ‘नाहीं चोलिया मोरे नइहर से आइल, नाहीं मोरा भेजले इयार हो, ई चोलिया मोरा मोरंग से अइले, भेजले ह हमरो भतार हो।’

नायिका की सुंदरता का यह वर्णन कितना मनभावन है, आप स्वयं देखिए……
जइसे लचके लवंगिया के डार, गोरिया पतरी।
पनवा जइसन गोरिया पातरी हो, फूलवा नियर सुकुमार…गोरिया पतरी।
भोजपुरी होली गीतों में भक्ति रस भी भरा होता है। देखिए कितना मनभावन बन पड़ा है यह गीत –
‘शिव सती खेले फाग अरे लाला शिव सती खेले फाग
नाचत भालु बजावत डमरू, शिव सती खेले फाग।’ सबसे बड़ी बात तो यह दिखाई देती है कि यहां राम-लक्ष्मण के साथ-साथ रावण को भी फाग खेलते दिखाया जाता है। उदाहरण के लिए ‘राम खेले होरी लछुमन खेले होरी, लंकागढ़ में रावण खेले होरी।’ जब एक घर से होली गाकर दूसरे घर की ओर टोली चलती है तो यह गीत गाते हुए चलती है –
सदा आनंद रहे एही द्वारे, मोहन खेले होरी हो।

एक और खेले कुंअर कन्हाई, एक ओर राधा प्यारी हो….सदा आनंद रहे एही द्वारे। बारह बजे रात को जब चइता चढ़ता है तो उसकी आगवानी में पांच चइता गाने के बाद होली का कार्यक्रम समाप्त होता है।

होली की विदाई और चइता की आगवानी का यह चलन चलता रहे, बस यही कामना है।

होली मुबारक।

Written By: Kumar Narendra Singh

Krishna Kumar
The state of Bihar has given a lot to the history of humanity but in recent past we had given child labour, women harresment, theft, murder and corruption. I am here to raise the voice.!

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