Bhojpuri Folk Song: भोजपुरी लोकगीत में जीवन के मर्म

Bihar-folklore-women

लोक संस्कृति समाज एवं किसी भी राष्ट्र की आत्मा होती है। लोक मस्तिक ने अपने इतिहास की कड़ियां, अपनी परंपरा, प्राचीन मूल्यों को अपने गीतों में, अपनी कथाओं में, जीवन के आनंद-उत्सवों में तथा नृत्य-नाटकों में जोड़ा है। ये मानव समाज के अने कार्यो के लिए वैदिक मंत्रों सा कार्य करते हैं।

हमारे भारतीय लोकजीवन का वास्तविक सांस्कृतिक विरासत उसके मौखिक एवं आडंबररहित साहित्यों से उदभासित होता है, जिनको हमने लोक साहित्य कहते हैं। इसमें भी लोकगीत का अहम स्थान होता है, जो अनायास ही इन गीत, कहावत व मुहावरों के माध्यम से अपनी संस्कृति, सभ्यता को एक पी़ढ़ी से दूसरी पीढ़ी को आगे बढ़ते है। यह मिट्टी से जुड़े लोगों की अंतरात्मा की आवाज है, जो जनसाधारण के लिए होती है। इसमें छंद, अलंकरण, व्याकरण या शास्त्रीय नियमों की जकड़न नहीं होती है। यही कारण है कि जब- काव्य प्रतिभा मंद पड़ जाती है, प्रजा का उत्साह क्षीण होने लगता है, शिक्षा का निर्झर सुखने लगता है, तब हमारा समाज लोकगीत व साहित्य के सम्मुख जाता है। शायद इसीलिए कहा गया है कि चाहे तुलसी से पूछो या शेक्सपीयर से- वह यहीं कहेंगे कि लोकगीत व साहित्य ही तुम्हारे गुरु है !

Magahi_folk_singers

ऐसे ही लोक साहित्यों में भोजपुरी लोक साहित्य ग्राम्यता के साथ जीवन के मर्म को बखूबी समेटे हुए है, जिसकी मौलिकता और विश्वसनीयता अटूट है। भोजपुरी लोक साहित्य व गीतों का क्षेत्र काफी विस्तृत है, जिसमें इतिहास, संस्कृति से लेकर जनजीवन के सभी पहलूओं का समावेश है।

उत्तर भारतीय इन लोकगीतों में जैतसारी, कीर्तन, निर्गुण, पूर्वी, भरथरी, आल्हा, डोमकच, जट-जटनी आदि लोक धुनों में लोक की जिंदगी थिरकती है। बालक के जन्म पर महिलाओं द्वारा सोहर गायन का रिवाज है। उत्तर भारत में ‘पवरिया ’ का घर-घर जाकर प्रसन्नता व्यक्त करने की परिपाटी है। अपवाद ही सही अब भी नानी-दादी की कविता, कहानी,लोरियांे के ताल एवं नाद पर बच्चों की नींद आती है। विवाह में तो हरेक अनुष्ठान के लिए अलग-अलग गीतों का परिचलन है। अब भी भोजपुरी इलाकों में वर्षा में कजरी, फागुन में फाग और गरमी में चईता की धून पर सरकते जीवन का दिग्दर्शन किया जा सकता है।

लोकगीत की व्यापकता मानव के जन्म से लेकर मृत्यु तक है। ये सबकी संपति मानी जाती है। आज का बच्चा कल बड़ा होने पर वह अपने बच्चों को यह सुनता है। मृत्यु जीवन का कटु सत्य है, जिसे भोजपुरी मानस (और भी क्षेत्रों में थोड़ा बदलाव के साथ गाया जाता है) में बच्चों को खेल-खेल मंे सिखाया जाता है।

अटकन चटकन दही चटाकन,
लौहा लाटा बन के काटा ।।
—————-
चुहुर चुहुर पानी गिरे, सब्बो जाबो गंगाजी रे ।
पावका पावका बेल खाबो, बेल के डारा टूटा गे।।

अर्थात् मनुष्य मरते समय अमृत पान करना चाहता है, जिसे गांवों में दही में पंचमेवा और शक्कर मिला कर बनाया जाता है। मृत्यु के बाद लौहा लाटा करते है यानि जल्दीबाजी करते है। तीसरी पंक्ति का भावार्थ है कि चुहुर चुहुर यानि बुुंद-बुंद करके ही पानी तर्पण के समय गिरता है।

लोकगीतों में जहां एक ओर आध्यात्मिकता तथा दार्शनिकता का भाव होता है, वही सामाजिकता भी।

भिखारी ठाकुर का ‘ विदेशिया ’ में घर की मजबूर दशा को देखकर नायक जब अपनी नई-नवेली नायिका को छोड़कर परदेश जाता है, तो कहता है—

bikhari-thakur_730x419

‘‘ चल जाइब परदेश में, तू घर में कर बहार ।
बरस- दिन पर आईब सुनल, छैल-छबीली नार ।। ’’

अर्थात् हम परदेश जा रहे है। इसीलिए ऐ प्रिये, तुम घर पर मौज मस्ती करो। हम तो अब वर्ष बीतने पर ही आ सकेंगे। तब नायिका कहती है—

चल जईब परदेश में, तब घर में रहब अकेल ।
कहे भिखारी कईसे चलिहें, बिन इंजन के रेल ।।

अर्थात् तुम परदेश चले जाओगे, तो हम घर में अकेले रहेंगे। पर यह तो बताते जाओ कि ईंजन के बिन गाड़ी कैसे चलेगी ?
मादक सुरभि संपन्न वसंत आगमन के समय जड़ चेतन सभी उल्लासित हुए। लज्जा और झिझक का आवरण उतरा और नायिका गुहार करने लगी–

आ गइले फागुन के बहार हो,
बहार लूटे आ जइयो गोइयां ।
रंग बहत हैं, गुलाल उड़त हैं
बहार लूटे आ जाइयो गोइया ।।

भारतीय नारी के लिए पति सर्वस्व होता है। इसके दर्शन से उसका सौंदर्य खिल उठता है-

म्ंागिया के सेंदुरा हो मंगिया के संेदुरा,
पिता देखि रह-रह टहके हो रामा।
चूड़ी मोरा खनके, बाजुबंद फड़के,
रूनझुन बाजेला, पायलिया हो रामा ।।

लोकगीतों में सामाजिकता के साथ वैज्ञानिकता भी है, घाघ भड्डरी की बातें मौसम विज्ञान से संबंध है—-

करिया बादर जिउ डरवावइ । भूरा बादर पानी लावइ ।।
लाल पियर जब होय आकाश। तब नाहीं बरसा के आसा ।।

लोकगीतों में स्वदेश व राष्ट्रवाद का भी झलक मिलता है। जब स्वदेश प्रेम व गीत की बात आती है, तो बाबू रघुवीर नारायण की कालातीत कविता ‘‘ बटोहिया ’’ का नाम बरबस ही आ जाता है, जिसे भोजपुरी साहित्य का राष्ट्रीय गीत भी कहा जाता है। 1911 में इस काव्य की रचना के बाद ही यह गीत भारत से बाहर माॅरिशस, न्यू गियाना, फीजी, वर्मा और सिंगापुर आदि देशों में प्रचलित हो गया। बिहार में जब गांधजी असहयोग आंदोलन के दौरान भागलपुर आये थे, तो इस गीत को देशरत्न राजेंद्र प्रसाद के अनुरोध पर सुनाया गया था। कहते है कि इस गीत को सुनने के बाद गांधीजी अभिभूत हो गये थे।

जाऊ- जाऊ भैया रे बटोही हिन्द देखि आऊ ।
जहां ऋषि चारों वेद गावे रे बटोहिया।।
नानक, कबीर, और शंकर, श्रीराम- कृष्ण ।
अलख के गीत बतावे रे बटोहिया ।।

Chhath Puja

एक मनुष्य के जीवन में विरह मिलन के क्षण आते है, इसका वर्णन —

पवन सुगंध मंद अगर गगनवा से,
कामिनी विरह राग गावे रे बटोहिया ।
तोता-तूती बोले राम बोले भेंजरजवा रे,
पपिहा के पीं-पीं जिया सालेरे बटोहिया ।।

उनकी एक रचना ‘‘ भारती-भवानी ’’ असहयोग आंदोलन के दौरान बिहार के सभी सम्मेलनों में मंगलाचरण बन गया था। 1912 के पटना में अखिल भारतीय कांग्रेस महाधिवेशन के अवसर पर ‘ वंदे मातरम ’ के साथ ही भारती-भवानी का भी गायन हुआ था–
bihar agriculture6

आज जब भोगवाद व खगोलीकरण के युग में जब व्यक्ति अपने से दूर दुनिया व उस अदृश्य शिखर को छुने की कोशिश में बिखर रहा है, तो लोकगीत पुनः समाज को जोड़ने की एक कड़ी बन सकते है। जन्म से मृत्यु, व्यक्ति से देश व सृष्टि के भावों को समेटे इन लोकगीत व साहित्य ही जीवन मूल्यों को अक्षुण्ण रखने में सक्षम है।

Written By: मयंक मुरारी

Chirag
Trying to connect you from almost all the hottest news of Bihar and the reason behind this is to ensure the proper awareness of all of the citizen.
So say AaoBihar

Comments

comments