बिहार की स्वेता सिंह, 900 km दूर से 800 बिहारी छात्रों को पढ़ा रही है

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स्वेता सिंह, एक गृहिणी है जिन्होंने अपने बिहार के बच्चों को पढ़ाने के सपनों को खास तरीके से पूरा किया है। PhD कम्पलीट कर चुकी स्वेता सिंह जी ने खास रूचि शिक्षा से बनाए रखा और शादी के बाद बिहार से दिल्ली आ कर भी बिहार के बच्चों को 900 km दूर से पढ़ा कर एक उज्जवल भविस्य दे रही है। इनके ही शब्दों से सुनते है इनकी कहानी:

मेरे पिता प्रोफेसर थे, उन्होंने IIT कानपुर से PhD करने के बाद भी वापस बिहार आकर, बिहारी स्टूडेंट्स को पढ़ने की ठानी तब जब उनके पास खुद वही IIT जैसे कॉलेज में प्रोफेसर बनने का मौका था। उनका छपरा वापस आना आज भी एक ऐसा कदम है जो हर एक इंसान जो उनको जानते थे उनके लिए इंस्पिरेशनल है। गांव से आकर कॉलेज में पढ़ रहे स्टूडेंट्स को क्लास में तो पढ़ते ही थे, साथ ही साथ न समझ आये तो घर बुला कर मुफ्त में भी आर्गेनिक केमिस्ट्री का पाठ पढ़ते थे।

इन सब को बेहद करीब से देख कर बचपन से ही में उनकी तरह बनना चाहती थी। शिक्षा के माध्यम से समाज का विकाश संभव है और इसी वजह से लोगो को शिक्षित करना ही मैंने अपना काम बनाया।

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शुरुआत से केमिस्ट्री में इंटरेस्ट की वजह से मैंने अपने कॉलेज की पढ़ाई केमिस्ट्री से की और M.Sc की पढ़ाई पूरी करी। एक प्रोग्रेसिव परिवार के होने की वजह से मुझे बिहार में रह कर भी अपने सपनो को जिन का मौका मिला और तब PhD में एडमिशन लिया, 2006 में शादी हो जाने के बाद एक ऐसा परिवार मिला जिसने मुझे आगे की पढ़ाई पूरी करने में बेहद सहयोग दिया। जिंदगी के हर मोड़ पर पति के सपोर्ट से हर मुश्किल आसान हुई थी, थीसिस तैयार करना, बच्चों को सम्भालना साथ सी साथ एक्सपेरिमेंट्स और परिवार सब एक साथ ले कर चलना संभव हुआ।

माँ अपने बच्चों के साथ फिर से अपना बचपन जीती है, और इसी वजह से मैंने अपने पढ़ाई के बाद जिंदगी अपने बच्चों को देना चाहा। दो बच्चों के माँ बनने के बाद उनको बड़ा होते देख आभास हुआ की काश: देश के हर बच्चों को सुख सुविधा मिले। खास कर उन बच्चों को जिन्हे हम छपरा में देखा करते थे जहां क्वालिटी के आभाव में बच्चों की इक्छा मर जाती है आगे पढ़ने की। एक बड़ा प्रश्न तब खड़ा हुआ

क्या होगा इन गाँव और छोटे शहर के बच्चों का, कैसे बढ़ेंगे ये? मेरे पिता के उस सैक्रिफाइस का क्या होगा? क्या किसी भी तरह मैँ नहीं कर सकती मदद इन बच्चों का? क्या फयदा हुआ हमारे शिक्षा का?

इन सब पर आत्ममंथन कर ठीक अगले दिन, मैंने पढ़ना शुरू किया कुछ बच्चों को।जब भी मौका मिलता अपने शहर जा कर कुछ समय बच्चों के साथ बिताना शुरू किया हमने। पर ऐसा साल में २०-३० दिन ही हो पता था। ये उस तरीके से आगे बढ़ नहीं सकता था। एक तरफ अपने बच्चों का डस्कूलिंग देख बहुत अच्छ लगता है पर दूसरे ही पल जब याद बिहार की आती है लगता आज भी शिक्षा में जंक लगा है। ये सब देख दुखी नहीं थे हम पर अफसोश था की कुछ कर नहीं प रहे है हम लोग।

दिसंबर 2015 की बात है जब मेरे भाई ने मुझे Eckovation के बारे में बताया और तब वो कुछ ऐसा सा अनुभव था जब लगा की अपने सपने को नयी उम्मीद मिली हो।

ये एक ऐसा मोबाइल एप्प है जो पेरेंट्स, स्टूडेंट्स और टीचर तो जोड़ता है और जिसपे हम जैसी गृहिणी कुछ घंटे निकल कर बच्चों सकती है।

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अब में रोज़ ६:३० बजे जागते ही बच्चों के लिए टायर किया नोट्स शेयर करती हु और साथ ही उनके साथ प्रैक्टिस प्रॉब्लम कर उनकी शिक्षा से जुडी हर सवाल को सुलझाने में मदद करती हु। दिन के ३-४ घंटे निकलना हम जैसे housewife के लिए आसान है और ठीक यही करते हुआ पिछले कुछ महीनो से में घर बैठे बैठे, अपने ही शहर के 800 से ज्यादा बच्चों को पढ़ा रही हु।

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आज मुझे यकीं है की मेरे पापा जहां कही भी होंगे उन्हें ख़ुशी होगी ये देख कर। २००४ में उनको खोने के बाद उनकी ही तरह बच्चों को पढ़ने का सपना अब मैँ जी रही हु। जिंदगी हमारी महत्वूर्ण है, हम खुशनशीब है जिन्हे कॉलेज जाने का मौका मिला, हमने पढ़ाई की और अब इसका सही उपयोग कर अगर हम महिलाएं चाहे तो पुरे भारत को शिक्षित कर सकते है। शिक्षा सबसे मजबूत हथियार होता है और इससे कुछ भी जीता जा सकता है और इसी कारण से हर वो लोग जो इसे प नहीं सकते उनकी मदद हमे बढ़ चढ़ कर करी चाहिए।

– स्वेता सिंह

इकोवेशन (Eckovation), एक मुफ्त और बहुत मददगार शिक्षा का एक ऐसा प्लेटफार्म है जिसे डाउनलोड करते ही, शिक्षक अपने छात्र-छात्रों से और उनके अभिभावकों से पलक जपकते जुड़ सकते है और ठीक उसी तरह, छात्र-छात्राएं और अभिभावक भी शिक्षक से जुड़ कर शिक्षा को आसानी से पा सकते है।

अधिक जानकारी के लिए आप Eckovation के टीम को लिख सकते है, उनका ईमेल एड्रेस है info@eckovation.com
मोबाइल एप्प डाउनलोड करने के लिए अपने playstore में या app store में Eckovation सर्च करे और डाउनलोड करे

 

Source: TheBetterIndia

 

Subhikhya
Not from Bihar, heard a lot about the state. Always interested in exploring the art culture and politics of the state. So here I am, writing and doing PR for AaoBihar.com
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