कुछ बेटियाँ बिना आंखों की रौशनी के रौशन कर रही है बिहार को

School of Blind Girls in Bihar

पटना के भाग-दौड़ भरी जिंदगी से बाहर निकल सड़क जाती है एक बालिका विद्यालय पर। कुम्हरार में स्थित ये विद्यालय नेत्रहीन बालिकाओं के लिए है। मेरे नेत्रहीन लिखने से आप इनको कमजोर मत समझियेगा, न ही लाचार। यहाँ पढ़ रही बालिकाएं ऐसी है जिन्हे रौशनी ने खुद से जरूर दूर रखा है पर राज्य को, देश को और विश्व को ये लड़कियाँ खुद अपने दम पर रौशन कर रही है। 

जानते है आप लोग, कुछ पहले की खबरों से बिहार की शिक्षा प्रणाली से विश्वास उठने लगा था मेरा, तब तक whatsapp ग्रुप में Eckovation को लेकर चर्चा हो रही थी और कुछ लोगो ने एक ऐसे बिहारी स्कूल के बारे में बताया जहां नेत्रहीन पढ़ती है। दिलचस्पी बड़ी, पटना आना हुआ और तब प्लान बन इस विद्यालय में आने का।

दीघा से चले हम स्कूटर पर अभिषेक के साथ, गूगल मैप का सहारा लिए पहुंच गए कुम्हरार मगर अब परेशानी थी इस स्कूल को ढूंढने की, माउंट कार्मेल, सेंट करेंस ये सब सबको पता होता है, मगर नेत्रहीन विद्यालय, नहीं महाराज,ये सब को पता नहीं होता है। कुछ लोग जानते ही नहीं थे की ऐसा भी स्कूल होता है, मगर सज्जन आज भी है, रास्ता पता चला और हम स्कूल पहुंचे। बड़े अक्षर में स्कूल का नाम, गेट के अंदर मैदान जहां खेती हुई थी और उसके अंदर दो मंजिला मकान, जो था हमारा स्कूल।

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अंदर गए अध्यापिका लोग से बात हुआ तो पता चला की लंच हुआ है और लड़कियों को खाना दिया जा रहा है। तब तक सवालो के साथ शुरू हुए हम। ये स्कूल 1993 में शुरू हुआ जहां अभी कुछ 100 बालिकाएं शिक्षित हो रही है, सभी नेत्रहीन है। उनका रहने, खाने और पढ़ने, तीनो का अरेंजमेंट वही है।

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इस बार 10वि की परीक्षा में मात्र 46% विद्यार्थी पास हुए है। इस बार इस विद्यालय से 9 लड़कियों ने एग्जाम दिया था जिनमे से सभी पास हुई है और ऐसे तैसे नहीं, 8 फर्स्ट डिवीज़न से और 1 सेकंड डिवीज़न से। महज 6-7 साल की उम्र में बालिकाएं यहाँ आ जाती है और तभी से उनको हर प्रकार की शिक्षा और सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। 

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बात करते हुए पता चला की ये लड़कियां यही नहीं रूकती है, 10वि के बाद इनको दिल्ली भी भेज जाता है जहां ये आगे की शिक्षा लेती है। यही पड़ी लड़कियां आज अपनी जिंदगी में इंजीनियर बन चुकी है, कुछ वकालत करती है, तो कुछ मैनेजर है। अलग अलग जगहों में बिहार का नाम रौशन कर रही यही।

यही बात चल रहा था तब तक तेज़ मधुर आवाज़ आना शुरू हुआ, पता लगा खाने के पहले का प्राथना चल रहा है।  दौड़ के जा कर वीडियो बनाए हम जो नीचे आप भी सुन और देख सकते है। ये यहाँ पढ़ती है, रहती है, खाती है, गाती है, संस्कार सीखती है, सिखाती है। अपना बर्तन धोना कपड़े धोना, अपने से छोटे बच्चों की मदद करना उन्हें रहना, चलना, खेलना सीखना सब करती है।

खा कर उठ कर बालिकाएं बरतन धोने साथ जोड़े बना निकलती जा रही थी। बड़ी, नयी आई लड़कियों के हाथ पकडे नल तक ले जा रही थी। आवाज़ दे समझा रही थी। तब तक अध्यापिका जी ने कहा की आये आपको हॉस्टल भी दिखते है।

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ताजुब होगा आपको इतनी सफाई IIT के हॉस्टल में नहीं था जो वह था और ये सफाई कोई और नहीं ये वह पढ़ रही नन्ही हाथो ने किया था।विद्यालय किताबी शिक्षा का केंद्र हो सकता है आपके हमारे लिए बन गया हो मगर ये ख़ास विद्यालय ऐसा था जिसे सम्पूर्ण कहा जा सकता है।

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अब हमको ये जरूर लगता है की बिहार की शिक्षा का मज़ाक बनने वाले वो घड़ा है आधे भरे है, छलकते जाते है क्युकी अगर पुरे भरे होते तो इस प्रकाश का पता जरूर जानते। गर्व है हमे इस स्कूल पर, ऐसे स्कूल को सहयोग देना हम सब का कर्त्तव्य बनता है।

एक बच्ची जो इसी विद्यालय में पड़ती है उसकी कहानी (वीडियो अनीता जी ने बनाया है, जो अमेरिका में भी रह कर इन बच्चों की आर्थिक और सामाजिक रूप से सहायता कर रही है )

आप सब लोगो से अनुरोध है की अगली बार जब भी आप पटना जाये, भले ही नए बने पार्क बिल्डिंग को घूमना छोड़ दे पर इस विद्यालय जरूर जाये और एक सलाम दे आये। इस विद्यालय को हम सब मिल कर सावरे तो रौशन पूरा जहान होगा।

Ritesh Singh
बिहार में जन्म हुआ और फिर भगवान ने बिहारी बनाया। तब से आज तक कुछ कुछ प्रयत्न कर रहे है कामयाब होने की।
गलती से IIT से B.Tech पास करने के बाद, AaoBihar पर लेख लिखना और पढ़ना शौक बन गया है।

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