ये हैं IIT के प्रोफेसर आलोक सागर: 21वीं सदी के बुद्ध

Alok-sagar-iit-delhi-prof-not-bihar
एक थे सिद्धार्थ गौतम जिन्होंने राजकुल में जन्म लिया। शिक्षा संस्कार लिए और फिर समाज के कल्याण के लिए निकल पड़े। लोग उन्हें गौतम बुद्ध के नाम से भी जानते हैं। दुनिया में 180 करोड़ लोग इनके अनुयायी हैं। एक हैं आलोक सागर, जिनका जन्म संभ्रांत परिवार में हुआ। उच्च शिक्षा हासिल की। प्रतिभा ऐसी कि शोध के लिए अमेरिका बुलाया गया। लौटो से IIT दिल्ली ने बतौर प्राफेसर नियुक्त किया, लेकिन समाज के लिए आदिवासी बन गए। परिवार भी संपन्न और उच्चशिक्षित है, जिंदगी में कोई तनाव भी नहीं था, सफलता कदम चूम रही थी परंतु पूरी जिंदगी आदिवासियों के नाम कर दी। पैरों में रबड़ की चप्पलें, हाथ में झोला, उलझे हुए बाल, कोई कह ही नहीं सकता कि ये वही व्यक्ति है जिसे अंग्रेजी सहित कई विदेशी भाषाएं आतीं हैं। लाखों आदिवासियों का जीवन संवार चुके हैं।
alok-sagar-iit-professor
प्रोफेसर आलोक सागर का जन्म 20 जनवरी 1950 को दिल्ली में हुआ। आईआईटी दिल्ली में इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग की। 1977 में अमेरिका के हृयूस्टन यूनिवर्सिटी टेक्सास से शोध डिग्री ली। टेक्सास यूनिवर्सिटी से डेंटल ब्रांच में पोस्ट डाक्टरेट और समाजशास्त्र विभाग, डलहौजी यूनिवर्सिटी, कनाडा में फैलोशिप भी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बन गए। यहां मन नहीं लगा तो नौकरी छोड़ दी। इस बीच वे यूपी, मप्र, महाराष्ट्र में रहे।
भाई-बहनों के पास भी है अच्छी डिग्रियां
आलोक सागर के पिता सीमा व उत्पाद शुल्क विभाग में कार्यरत थे। एक छोटा भाई अंबुज सागर आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर है। एक बहन अमेरिका कनाडा में तो एक बहन जेएनयू में कार्यरत थी। सागर बहुभाषी है और कई विदेशी भाषाओं के साथ ही वे आदिवासियों से उन्हीं की भाषा में बात करते हैं। आलोक सागर 25 सालों से आदिवासियों के बीच रह रहे हैं। उनका पहनावा भी आदिवासियों की तरह ही है।
पता कैसे चला 
उनके बारे में किसी को जानकारी भी नहीं होती अगर बीते दिनों घोड़ाडोंगरी उपचुनाव में उनके खिलाफ कुछ लोगों द्वारा बाहरी व्यक्ति के तौर पर शिकायत नहीं की गई होती। पुलिस से शिकायत के बाद जांच पड़ताल के लिए उन्हें थाने बुलाया गया था। तब पता चला कि यह व्यक्ति कोई सामान्य आदिवासी नहीं बल्कि एक पूर्व प्रोफेसर हैं।
alok-sagar-iit-professor-1
आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ रहे हैं आलोक
आलोक सागर ने 1990 से अपनी तमाम डिग्रियां संदूक में बंदकर रख दी थीं। बैतूल जिले में वे सालों से आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन बीता रहे हैं। वे आदिवासियों के सामाजिक, आर्थिक और अधिकारों की लड़ाई लड़ते हैं। इसके अलावा गांव में फलदार पौधे लगाते हैं। अब हजारों फलदार पौधे लगाकर आदिवासियों में गरीबी से लड़ने की उम्मीद जगा रहे हैं। उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर चीकू, लीची, अंजीर, नीबू, चकोतरा, मौसंबी, किन्नू, संतरा, रीठा, मुनगा, आम, महुआ, आचार, जामुन, काजू, कटहल, सीताफल के सैकड़ों पेड़ लगाए हैं।
Alok-sagar-iit-delhi-prof
बच्चों की पढ़ाई में करते हैं मदद
आलोक आज भी साइकिल से पूरे गांव में घूमते हैं। आदिवासी बच्चों को पढ़ाना और पौधों की देखरेख करना उनकी दिनचर्या में शामिल है। कोचमहू आने के पहले वे उत्तरप्रदेश के बांदा, जमशेदपुर, सिंह भूमि, होशंगाबाद के रसूलिया, केसला में भी रहे हैं। इसके बाद 1990 से वे कोचमहू गांव में आए और यहीं बस गए।
Chirag
Trying to connect you from almost all the hottest news of Bihar and the reason behind this is to ensure the proper awareness of all of the citizen.
So say AaoBihar

Comments

comments