Kabir Das in Bhojpuri Folklore

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The poetries of Kabir is never the less famous and known to everyone but his contribution to Bhojpuri is not widely available. Here we are posting the 4 poetries that will give the real idea of the society of that time and then one can compare the society of present, How far we have changed our thought?

तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में – कबीरदास

तोर हीरा हिराइल बा किंचड़े में।।

कोई ढूँढे पूरब कोई पच्छिम,

कोई ढूँढ़े पानी पथरे में।। 1।।
सुर नर अरु पीर औलिया,
सब भूलल बाड़ै नखरे में।। 2।।
दास कबीर ये हीरा को परखै,
बाँधि लिहलैं जतन से अँचरे में।। 3।।
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मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा – कबीरदास

मन न रँगाये रँगाये जोगी कपड़ा।।

आसन मारि मंदिर में बैठे,
नाम छाड़ि पूजन लागे पथरा।। 1।।
कनवां फड़ाय जोगी जटवा बढ़ौले,
दाढ़ी बढ़ाय जोगी होइ गैले बकरा।। 2।।
जंगल जाय जोगी धुनिया रमौले,
काम जराय जोगी होइ गैलै हिजरा।। 3।।
मथवा मुड़ाय जोगी कपड़ा रंगौले,
गीता बाँचि के होइ गैले लबरा।। 4।।
कहहि कबीर सुनो भाई साधो,
जम दरबजवाँ बाँधल जैवे पकरा।। 5।।————————————————-

का ले जैबो ससुर घर – कबीरदास

का ले जैबो, ससुर घर ऐबो।।

गाँव के लोग जब पूछन लगिहैं,

तब तुम का रे बतैबो ।। 1।।
खोल घुंघट जब देखन लगिहैं,
तब बहुतै सरमैबो ।। 2।।
कहत कबीर सुनो भाई साधो,
फिर सासुर नहिं पैबो ।। 3।।
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कौ ठगवा नगरिया लूटल हो – कबीरदास

कौ ठगवा नगरिया लूटल हो।।
चंदन काठ कै वनल खटोलना,
तापर दुलहिन सूतल हो।। 1।।

उठो री सखी मोरी माँग सँवारो,
दुलहा मोसे रूसल हो।। 2।।

आये जमराज पलंग चढ़ि बैठे,
नैनन आँसू टूटल हो।। 3।।

चारि जने मिलि खाट उठाइन,
चहुँ दिसि धू-धू उठल हो।। 4।।

कहत कबीर सुनो भाई साधो,
जग से नाता टूटल हो।। 5।।

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