महात्मा गांधी का चंपारण सत्याग्रह

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बिहार में चंपारण जिले को ये सौभाग्य प्राप्त है कि दक्षिण अफ्रिका से वापस आकर महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह आन्दोलन का प्रारम्भ यहीं से किया। चंपारण सत्याग्रह में गाँधी जी को सफलता भी प्राप्त हुई। चंपारण में अंग्रेजों ने नील बनाने के अनेकों कारखाने खोल रखे थे। ऐसे अंग्रेजों को निहले कहा जाता था। इन अंग्रेजों ने चंपारण की अधिकांश ज़मीनों को हथियाकर उस पर अपनी कोठियां बनवा ली थी। ये अंग्रेज यहाँ के किसानो को नील की खेती के लिए मजबूर करते थे। अंग्रेजों का कहना था कि एक बीघे ज़मीन पे तीन कठ्ठे नील की खेती जरूर करें। इस प्रकार पैदा हुई नील को ये निहले कौड़ियों के दाम खरीदते थे। इस प्रथा को तीन कठिया प्रथा कहा जाता था। इस प्रथा के कारण चंपारण के किसानों का भंयकर शोषण हो रहा था। फलतः किसानो में अंग्रेजों के खिलाफ व्यापक असंतोष फैल चुका था।

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ये अंग्रेज यहाँ की जनता का अन्य प्रकार से भी शोषण किया करते थे, जिससे व्यथित होकर चंपारण के एक निवासी राजकुमार शुक्ल जो स्वंय एक किसान थे, इस अत्याचार का वर्णन करने के लिए गाँधी जी के पास गये। राजकुमार शुक्ल के सतत प्रयत्नो से ही राष्ट्रीय कांग्रेस के 1916 के अधिवेशन में एक प्रस्ताव प्रस्ताव पारित कर चंपारण के किसानो के प्रति सहानुभूति प्रकट की गई। राजकुमार शुक्ल के साथ गाँधी जी 10 अप्रैल 1917 को पटना पहुँचे और वहाँ से उसी रात्रि मुजफ्फर नगर के लिए रवाना हो गये। पटना प्रवास के दौरान गाँधी जी वहाँ के प्रसिद्ध वकील बाबु राजेन्द्र प्रसाद से मिलना चाहते थे परन्तु राजेन्द्र बाबु उस समय वहा मौजूद नही थे। गाँधी जी अपने मित्र मौलाना मजरुल्लहक जो प्रतिष्ठित बैरिस्टर थे, उनसे मिलकर नील की खेती से सम्बंधित समस्या की जानकारी ली और इससे निजात हेतु विचार विमर्श किया ।

15 अप्रेल को गाँधी जी मोतिहारी पहुँचे, वहाँ से 16 अप्रैल की सुबह जब गाँधी जी चंपारण के लिये प्रस्थान कर रहे थे, तभी मोतीहारी के एस डी ओ के सामने उपस्थित होने का सरकारी आदेश उन्हे प्राप्त हुआ। उस आदेश में ये भी लिखा हुआ था कि वे इस क्षेत्र को छोङकर तुरंत वापस चले जायें। गाँधी जी ने इस आज्ञा का उलंघन कर अपनी यात्रा को जारी रखा।

Mahtma Gandhi

आदेश की अवहेलना के कारण उनपर मुकदमा चलाया गया। चंपारण पहुँच कर गाँधी जी ने वहाँ के जिलाअधिकारी को लिखकर सुचित किया कि, “वे तब तक चंपारण नही छोङेगें, जबतक नील की खेती से जुङी समस्याओं की जाँच वो पूरी नही कर लेते।“ जब गाँधी जी सबडिविजनल की अदालत में उपस्थित हुए तो वहाँ हजारों की संख्या में लोग पहले से ही गाँधी जी के दर्शन को उपस्थित थे। मजिस्ट्रेट मुकदमें की कार्यवाही स्थगित करना चाहता था, किन्तु गाँधी जी ने उसे ऐसा करने से रोक दिया और कहा कि सरकारी उलंघन का अपराध वे स्वीकार करते हैं। गाँधी जी ने वहाँ एक संक्षिप्त बयान दिया जिसमें उन्होने, चंपारण में आने के अपने उद्देश्य को स्पष्ट किया। उन्होने कहा कि “वे अपनी अंर्तआत्मा की आवाज पर चंपारण के किसानों की सहायता हेतु आये हैं और उन्हे मजबूर होकर सरकारी आदेश का उलंघन करना पङा। इसके लिए उन्हे जो भी दंड दिया जायेगा उसे वे भुगतने के लिये तैयार हैं।“ गाँधी जी का बयान बहुत महत्वपूर्ण था। तद्पश्चात बिहार के लैफ्टिनेट गर्वनर ने मजिस्ट्रेट को मुकदमा वापस लेने को कहा। इस प्रकार गाँधी जी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन का ज्वलंत उदाहरण पेश किया। गाँधी जी की बातों का ऐसा असर हुआ कि, वहाँ की सरकार की तरफ से उन्हे पूरे सहयोग का आश्वासन प्राप्त हुआ। चंपारण के किसानो की समस्या को सुलझाने में गाँधी जी को बाबू राजेन्द्र प्रसाद, आर्चाय जे पी कृपलानी, बाबु बृजकिशोर प्रसाद तथा मौलाना मजरुल्लहक जैसे विशिष्ट लोगों का सहयोग भी प्राप्त हुआ।

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गाँधी जी और उनके सहयोगियों तथा वहाँ के किसानों की सक्रियता के कारण तत्कालीन बिहार सरकार ने उच्च स्तरिय समीति का गठन किया जिसके मनोनीत सदस्य गाँधी जी भी थे। इस कमेटी की रिपोर्ट को सभी पक्षों द्वारा स्वीकार किया गया और तीन कठ्ठा प्रथा समाप्त कर दी गई। इसके अलावा किसानों के हित में अनेक सुविधायें दी गईं। इस प्रकार निहलों के विरुद्ध ये आन्दोलन सफलता पूवर्क समाप्त हुआ।

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इससे चंपारण के किसानों में आत्मविश्वास जगा और अन्याय के प्रति लङने के लिये उनमें एक नई शक्ति का संचार हुआ। चंपारण सत्याग्रह भारत का प्रथम अहिंसात्मक सफल आन्दोलन था। महात्मा गाँधी के नेतृत्व प्रति जन-साधारण की आस्था का श्री गंणेश चंपारण सत्याग्रह से ही हुआ था। इस प्रकार गाँधी जी द्वारा भारत में पहले सत्याग्रह आन्दोलन का शंखनाद चंपारण से शुरु हुआ।

Source: AachiKhabar

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A girl from the capital of Bihar, trying to understand the past underdevelopment of Bihar and exploring the ways to improve the status of the State

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