पीकू, कुछ चीज़ों का खुमार धीरे-धीरे चढ़ता है और फिर उतरने का नाम नहीं लेता

sum

कुछ चीज़ों का खुमार धीरे-धीरे चढ़ता है और फिर उतरने का नाम नहीं लेता। कुछ ऐसी सी फिल्म है पीकू।
कभी बात होती थी सिनेमा में जब हीरो आता था, हीरोइन आती थी और खुमार अपनी मक़ाम पे होता था बस तभी से सिनेमा फिर गिरने लगता था। मगर कसम से अद्वितीय सिनेमा बनाया गया है ये। इस सिनेमा में आपको कलाकार दिखेगा और हीरो हीरोइन नहीं। बस कमाल बात ये है की हर कलाकार से फिर आपको प्या भी हो जायेगा।
एक बार फिर अमिताभ बच्चन साहेब, The Last Lear के बाद ऐसे दिखे है, जहाँ उन्हें भूल पाना पुरे जहान को मुमकिन न होगा। दीपिका में इतनी सादगी की खुद को हीरोइन के दर्जे से निकल फेक पीकू बन जाये, ये नामुमकिन था सोचना। ऐसे अगर गलत साबित होते है आप तो जाने कितनी खुशिया पेट से दिल तक भर जाती है, कुछ जयादा नहीं, बस पीकू ने इतना दिया है देखने वालो को। इरफ़ान, इनके अदाकारी की बात जग जाहिर है पर जो छुपी रूहानियत वाली मुश्कान इनकी जो प्यार दरसाती है वो अभी तक अनदेखी थी।
कसक सिनेमा के कुछ दिनों तक रहता है एक बार देख लेने भर से, कुछ ऐसा बना दिया गया है। सिनेमा के डायरेक्टर का नाम नहीं याद पर तहे दिल से सुक्रिया है उनको। सिनेमा इरफ़ान और अमिताभ के लिए देखने गया था और प्यार दीपिका से हो जाता है।
पीकू जिंदगी की कुछ चुनिंदा सिनेमा में से एक बन गयी है।

Sanskriti
A girl from the capital of Bihar, trying to understand the past underdevelopment of Bihar and exploring the ways to improve the status of the State

Comments

comments