एक अधूरी यात्रा – एक छोटी सी कहानी बिहार से

कल की बात है सुबह उठा और ड्राइवर को फोन किया की “अरे भाई एयरपोर्ट चलना है साढ़े चार का हवाई जहाज है, बारह बजे आ जाना”। तभी बिना देर किए उधर से आवाज़ आई, “न भैया एतना देर से मत चलिए आजकल पुल पर पूरा जाम रह रहा है। ग्यारह बजे निकला जायेगा”। सहमति जताने के अलावा और कुछ कर नहीं सकते थे हम, तो तय हुआ की 11 बजे पटना हवाई अड्डे की यात्रा शुरू होगी।

बहरहाल हम आपको वाकिफ करा दे की खुद हम छपरा के रहने वाले है और अब जब से नौकरी का सिलसिला शुरू हुआ है घर आना-जाना कम हो गया है। कुछ साल बाद चार दिनों के लिए घर आये थे। इन दिनों आने के पीछे विशेष मनसा थी, होली में आना खतरे से खाली नहीं होता और गर्मी में आना जानलेवा, तो मार्च का महीना ही बेहतर होता है। मोज़र से भरे आम के पेड़ टिकोलो में बदलते है और पके गेहूं और सरसो, पुरे खेत को पीला रंग देते है।

तो उस दिन सुबह, जो मेरे लिए नौ बजे होती है, के तुरंत बाद नास्ता-वास्ता कर हम अपनी यात्रा पर निकल लिए। जब तक शहर में थे, दुकानो पर कड़ी पड़ी जलेबियाँ और ठण्डी कचौरिया दिखा रही थी और थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर गांव की बाजार में लिट्टी चोखा बिकना शुरू हो गया था।

छपरा से निकल हम पहले डोरीगंज पहुंचे जहा बंगाली बाबा का घाट मशहूर है, छठ में यहाँ का भीड़ देखने लायक होता है। डोरीगंज की आधी बनी चार लेन की सड़क आती है जो धूल में सनी, पर गंगा के बिल्कुल साथ-साथ चलती है। दाए बगल गंगा का दर्शन हुआ तो ड्राइवर साहेब हाथ जोड़ आशीर्वाद लिए, अपने बच्चों पर कृपा बनाये रखने की कामना मांगी और गाड़ी रेल कर दिया। आमी पहुंचे तो फिर से अम्बिका भवानी की तरफ जाने वाले रस्ते में ड्राइवर साहेब ने अपने लफ्ज़ दोहराये ।

चलते चलते हाजीपुर १:३० घण्टे में पहुंच गए तब हमने कहा,
” ई 80 km में 60 तो हो ही गया है वो भी 90 मिनटवा में, चाय पानी पिया जाये लगायें गाड़ी बाज़ार में”।
ड्राइवर ने मज़े लेते हुए हंस के कहा की “बाबू साहेब इहा तक तो सब पहुंच जाते है पर जो पुल पार करे  टाइम से उसी पर गंगा माइआ का वरदान है”।
फिर से मैंने मन को काबू में कर सोचा पटना पहुंच कर ही चाय पानी पिया जायेगा।

सफर में कुछ ही देर बाद पासवान चौक आया और उसको पार कर गंगा नदी पर बना ऐतिहासिक गांधी सेतु, जो कहा जाता है की 90 दशक तक एशिया में नंबर एक पुल में अपना नाम दर्ज़ करता था। जाम न देख दोनों बहुत खुश हुए, गाडी फिर से रेल हुई।

कुछ २-३ मिनट चलने के बाद जो आलम दिखा की क्या कहे, लम्बी क़तार लगी थी गाड़ियों की और तब समय हो रहा था 12:47। ड्राइवर के अनुसार एक घंटे की छुट्टी हो चुकी थी। मैंने आगे का दरवाजा खोल पीछे का सीट पकड़ा और सोने में थोड़ा भी विलंब न किया।
मस्त नींद का क्या कहे, वक़्त कितना गुज़ारा पता नहीं चलता, खास कर आप इंजीनियरिंग के छात्र रहे है तो जरूर मोल समझते होंगे नींद का, आह।

निश्चिन्त सो रहा था और उसमें डरा देने वाला सपना, औरत के रोने का सपना। सपना था क्या, नहीं नहीं अर्ध निद्रा में था और सही में होने वाली घटना सपना लग रहा था।

“आरे बाप हो, ऐ भइया हो खोली न दरवजवा, अरे ऐ दाता खोली न हो बबुआ” इतनी तेज़ चीखती आवाज़ थी की कान तक पहुंची और आँख खुला। खुलते ही मैंने ड्राइवर से पूछा कौन था, तो उसने कहा की हो सकता है भिखारी हो। आँखे बंद किया फिर से मैंने, पर इस बार नींद नहीं थी बस ३०-४० सेकंड  के बाद फिर से आवाज़ आई,
“अरे दाता , हे भगवान, दया करि हो बबुआ, तानी मदद करी”
बिना देर के आँख उधर को गया देखा, बिखरे हुए बाल, चेहरा धूल पसीने और आंसू में सना। देर न करते शीशा खोला खबर ली।

बात ये थी की किसी पास के गाँव से आ रही इस औरत के पति के छाती में भयंकर दर्द हो रहा था और घरबराहट उसकी और उसके पति की चरम सीमा पर थी। मदद चाहिए था उससे की खटारा टेम्पू से उसे उसके मर्द को किसी कार से लिफ्ट चाहिए था। क्योंकी कार खाली ही थी मेरी मैंने ऐसा किया, कुछ २०० मी दूर उस खटारा टेम्पू से उससे उठा, मैं और मेरे ड्राइवर ने उसे कार में पहुंचाया।

औरत ने थोड़ा सुकून का सांस लिया। इन सब क्रम में कम से कम पंद्रह मिनट लगे पर सड़क वैसे ही जाम में फंसी। गाड़ी में आ कर भी उस आदमी का पसीना कम न हुआ।
गाड़ी थोड़ी दूर आगे चली पर फिर से वही आलम। इन सब जामो के बीच, पैदल चलने के लिए बनायी फूटपाथ पे से सटा सट मोटरसाइकिल निकल रही थी और उतनी ही रफ़्तार से इस आदमी की तबियत ख़राब हो रही थी और औरत का चिल्लाना बढ़ रहा था। सड़क पर फंसे चार चक्को वाली गाड़ीयां, मरे आदमी की तरह मुर्दा खड़ी थी।

इतने में ड्राइवर से किसी मोटरसाइकिल वालो को रोकने को कहा। जेब से कुछ पैसे निकाले औरत को दिए बोला की किसी भी  अस्पताल में पहले भर्ती कराये। कार से निकलने के क्रम में मैंने पाया की आदमी बेहोश सा हो रहा है।

बाइक वाले आदमी को थैंक्स बोल तुरंत ले जाने को कहा। जाम जस का तस, वक़्त 1:35, नींद गायब और सैकड़ो सवाल मन में।

इतनी सस्ती जिंदगी भला कहां होगी, जाम में मरीज़ो का ये हाल क्यों, कई 1000 करोड़ के घोटालो का कुछ १ प्रतिशत भी यहाँ लगा होता तो दूसरा गांधी सेतु बना न होता? लालू के १५ साल , नितीश के १० साल सब बेकार ?

इन सब के बीच ड्राइवर ने पूछा, “कब तक अंदर जाने देगा आपको?”
“कहा अंदर जाना है, अच्छा एयरपोर्ट पर! साढ़े ३ तक।”
“अच्छा है, तब तक पहुंच जायेगे”
गाड़ी चलना शुरु हुआ, नदी दिखने सी लगी, 2 बज चुके थे, आगे बढ़ने पर पता चला की ट्रक के ख़राब होने का जाम  था सब। एक बार वो पार होने पर अगले १५ मिनट में हम पुल पार कर चुके थे।

गाड़ी अचानक धीरे चलने लगा, सड़क खाली ही सी थी। अब गाड़ी ख़राब न हो भगवान, ” क्या हुआ गाड़ी भी धोखा देगा क्या?”
“अरे बाबू साहेब, नहीं देखे!”
“क्या”
“मर गया”
“कहां”
“सड़क पर”
“गाड़ी घुमाओ”

सड़क के किनारे पड़ी रोती बिखलाती पड़ी उस औरत ने पति की लाश को धूल में सान रखा था। औरत की बहती लोर लाश के चेहरे की धूल को धो रही थी, मोटर साइकिल वाला वही खड़ा था और कुछ लोग जमा हो रहे थे। दूसरी तरफ गाड़ी छोड़, वहां पहुंचा औरत और मरे लाश को गाड़ी में रख गाँव गया और फिर छपरा।

यात्रा अधूरी रही… साथ अनेक सवाल दे गयी।

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जाने कितने लोग मारे जाते होगे न इस जाम में, बस हम ये मानते है की कोई अपना न फंसे इसमें बाकि मरने दो जो मरते है क्यु, यही इंतज़ार कर रहे है न हम सब..?

Ritesh Singh
बिहार में जन्म हुआ और फिर भगवान ने बिहारी बनाया। तब से आज तक कुछ कुछ प्रयत्न कर रहे है कामयाब होने की।
गलती से IIT से B.Tech पास करने के बाद, AaoBihar पर लेख लिखना और पढ़ना शौक बन गया है।

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